कस्मिन्नङ्गे तपस्तस्याधि तिष्ठति कस्मिन्नङ्गमृतमस्याध्याहितम् । क्व व्रतं क्व श्रद्धा कस्मिन्नङ्गे सत्यमस्य प्रतिष्ठितम् ॥
Kasminn aṅge tapas tasyādhi tiṣṭhati kasminn aṅgam ṛtam asyādhyāhitam | kva vrataṃ kva śraddhā kasminn aṅge satyam asya pratiṣṭhitam ||

📖 भावार्थ एवं दार्शनिक विश्लेषण

"Atharvaveda 10.7.1 का यह पावन मंत्र हमें Truth & Liberation और सृष्टि के शाश्वत नियम (ऋत) के प्रति समर्पित रहने की प्रेरणा देता है। यह परमसत्ता और जीवन के दिव्य स्वरूप का वंदन करता है।"

यह दिव्य ऋचा Atharvaveda से उद्भूत है, जिसके द्रष्टा Rishi Atharvan हैं और मुख्य देवता Skambha / Brahman हैं। वैदिक संस्कृति में यह श्लोक मनुष्य और ब्रह्मांड के अटूट आध्यात्मिक संबंध को रेखांकित करता है तथा चेतना को उच्चतर सत्य की ओर अग्रसर करता है।

विज्ञापन / ADVERTISEMENT

🧭 दैनिक जीवन में उपयोगिता एवं मार्गदर्शन

Penerapan dalam Kehidupan Nyata

दैनिक जीवन में यह मंत्र हमें Truth & Liberation के मार्ग पर चलने की शक्ति प्रदान करता है। तनाव, संशय और नैतिक दुविधाओं के समय इसका ध्यान मन को शांति, स्पष्टता और दृढ़ संकल्प प्रदान करता है।

🏛️ इतिहास, द्रष्टा ऋषि एवं वैदिक संदर्भ

वैदिक परंपरा की अमूल्य धरोहर के रूप में Atharvaveda 10.7.1 का यह मंत्र युगों-युगों से ऋषियों और मुनियों द्वारा संजोया गया है। यह सनातन दर्शन की सार्वभौमिक प्रज्ञा का प्रतीक है।

Metrum / Chhandas: Trishtubh

Aspek Ketuhanan (Devata): Skambha / Brahman

← Ayat Sebelumnya (Atharvaveda 19.53.1) Ayat Selanjutnya (Atharvaveda 10.8.44) →