भावार्थ एवं दार्शनिक विश्लेषण
"परम सत्य (ईश्वर) केवल एक ही है; ज्ञानी मुनिजन उसे अग्नि, यम, मातरिश्वन् आदि अनेक नामों से व्याख्यायित करते हैं।"
ऋग्वेद (१.१६४.४६) का यह सूक्त महर्षि दीर्घतमा की अमर प्रज्ञा का परिचायक है। यह श्लोक संकीर्ण धार्मिक कट्टरता का खंडन कर वैश्विक सहिष्णुता और एकात्मता की नींव रखता है।
दैनिक जीवन में उपयोगिता एवं मार्गदर्शन
Penerapan dalam Kehidupan Nyata
विभिन्न संस्कृतियों, विचारों और मतांतरों के बीच सामंजस्य स्थापित करने के लिए यह जीवन-मंत्र है। मतभेद केवल शब्दों का है, सारतत्व एक ही है—इस भाव को अपनाकर समाज में शांति स्थापित की जा सकती है।
इतिहास, द्रष्टा ऋषि एवं वैदिक संदर्भ
स्वामी विवेकानन्द ने १८९३ के शिकागो विश्व धर्म सम्मेलन में इसी ऋग्वैदिक मन्त्र के माध्यम से भारत के सार्वभौम समन्वयवादी दृष्टिकोण को विश्वपटल पर प्रस्तुत किया था।
Metrum / Chhandas: Trishtubh
Aspek Ketuhanan (Devata): Vishvedevas