संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम् । देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते ॥
Saṃgacchadhvaṃ saṃvadadhvaṃ saṃ vo manāṃsi jānatām | devā bhāgaṃ yathā pūrve saṃjānānā upāsate ||

📖 भावार्थ एवं दार्शनिक विश्लेषण

"हम सब साथ चलें, मिलकर बोलें, हमारे मनों में एक जैसा विचार और समझ हो; जिस प्रकार प्राचीन काल में ज्ञानी जन एकमत होकर अपना कर्तव्य निभाते थे।"

ऋग्वेद के दसवें मण्डल का यह अंतिम सूक्त (१०.१९१.२) संगठन सूक्त कहलाता है। यह सम्पूर्ण मानव जाति को जाति, वर्ण और सीमा से परे जाकर एक सूत्र में पिरोने का वैदिक घोषणापत्र है।

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🧭 दैनिक जीवन में उपयोगिता एवं मार्गदर्शन

Penerapan dalam Kehidupan Nyata

पारिवारिक सामंजस्य, संगठनात्मक सफलता और लोकतांत्रिक राष्ट्र-निर्माण में यह मन्त्र परस्पर संवाद, साझा लक्ष्य और सामूहिक उत्तरदायित्व की अनिवार्यता सिखाता है।

🏛️ इतिहास, द्रष्टा ऋषि एवं वैदिक संदर्भ

यह मन्त्र प्राचीन भारतीय गणराज्यों (सभा और समिति) का मूल आदर्श वाक्य रहा है और आज भी वैश्विक शांति सम्मेलनों में सामूहिक प्रार्थना के रूप में गाया जाता है।

Metrum / Chhandas: Anushtubh

Aspek Ketuhanan (Devata): Samjnana (Kesadaran Kolektif)

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