पृणीयादिन्पृणते भोज्याय मधीयांसं पन्थामनु पश्येत दीर्घम् । ओ हि वर्तन्ते रथ्येव चक्राऽन्यमन्यमुप तिष्ठन्त रायः ॥
Pṛṇīyād in pṛṇate bhojyāya madhīyāṃsaṃ panthām anu paśyeta dīrgham | o hi vartante rathyeva cakrā 'nyam anyam upa tiṣṭhanta rāyaḥ ||

📖 भावार्थ एवं दार्शनिक विश्लेषण

"Rigveda 10.117.5 का यह पावन मंत्र हमें Duty & Right Living और सृष्टि के शाश्वत नियम (ऋत) के प्रति समर्पित रहने की प्रेरणा देता है। यह परमसत्ता और जीवन के दिव्य स्वरूप का वंदन करता है।"

यह दिव्य ऋचा Rigveda से उद्भूत है, जिसके द्रष्टा Rishi Bhikshu Angirasa हैं और मुख्य देवता Dana (Kedermawanan) हैं। वैदिक संस्कृति में यह श्लोक मनुष्य और ब्रह्मांड के अटूट आध्यात्मिक संबंध को रेखांकित करता है तथा चेतना को उच्चतर सत्य की ओर अग्रसर करता है।

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🧭 दैनिक जीवन में उपयोगिता एवं मार्गदर्शन

Penerapan dalam Kehidupan Nyata

दैनिक जीवन में यह मंत्र हमें Duty & Right Living के मार्ग पर चलने की शक्ति प्रदान करता है। तनाव, संशय और नैतिक दुविधाओं के समय इसका ध्यान मन को शांति, स्पष्टता और दृढ़ संकल्प प्रदान करता है।

🏛️ इतिहास, द्रष्टा ऋषि एवं वैदिक संदर्भ

वैदिक परंपरा की अमूल्य धरोहर के रूप में Rigveda 10.117.5 का यह मंत्र युगों-युगों से ऋषियों और मुनियों द्वारा संजोया गया है। यह सनातन दर्शन की सार्वभौमिक प्रज्ञा का प्रतीक है।

Metrum / Chhandas: Trishtubh

Aspek Ketuhanan (Devata): Dana (Kedermawanan)

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