स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम् । कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः ॥
Sa paryagāc chukram akāyam avraṇam asnāviraṃ śuddham apāpaviddham | kavir manīṣī paribhūḥ svayambhūr yāthātathyato 'rthān vyadadhāc chāśvatībhyaḥ samābhyaḥ ||

📖 भावार्थ एवं दार्शनिक विश्लेषण

"Shukla Yajurveda 40.8 का यह पावन मंत्र हमें Truth & Liberation और सृष्टि के शाश्वत नियम (ऋत) के प्रति समर्पित रहने की प्रेरणा देता है। यह परमसत्ता और जीवन के दिव्य स्वरूप का वंदन करता है।"

यह दिव्य ऋचा Yajurveda से उद्भूत है, जिसके द्रष्टा Rishi Yajnavalkya हैं और मुख्य देवता Purusha हैं। वैदिक संस्कृति में यह श्लोक मनुष्य और ब्रह्मांड के अटूट आध्यात्मिक संबंध को रेखांकित करता है तथा चेतना को उच्चतर सत्य की ओर अग्रसर करता है।

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🧭 दैनिक जीवन में उपयोगिता एवं मार्गदर्शन

Penerapan dalam Kehidupan Nyata

दैनिक जीवन में यह मंत्र हमें Truth & Liberation के मार्ग पर चलने की शक्ति प्रदान करता है। तनाव, संशय और नैतिक दुविधाओं के समय इसका ध्यान मन को शांति, स्पष्टता और दृढ़ संकल्प प्रदान करता है।

🏛️ इतिहास, द्रष्टा ऋषि एवं वैदिक संदर्भ

वैदिक परंपरा की अमूल्य धरोहर के रूप में Shukla Yajurveda 40.8 का यह मंत्र युगों-युगों से ऋषियों और मुनियों द्वारा संजोया गया है। यह सनातन दर्शन की सार्वभौमिक प्रज्ञा का प्रतीक है।

Metrum / Chhandas: Trishtubh

Aspek Ketuhanan (Devata): Purusha

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