कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥
Karmaṇy evādhikāras te mā phaleṣu kadācana | mā karma-phala-hetur bhūr mā te saṅgo 'stv akarmaṇi ||

📖 भावार्थ एवं दार्शनिक विश्लेषण

"तेरा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मफल की वासना वाला मत बन और न ही तेरी आसक्ति कर्म न करने (अकर्मण्यता) में हो।"

श्रीमद्भगवद्गीता (२.४७) में उद्घोष यह श्लोक वैदिक कर्मयोग का प्राणतत्व है। यह सिखाता है कि फल की चिंता किए बिना अपने कर्तव्य का पूरी निष्ठा और कौशल से पालन करना ही सच्ची सफलता और मानसिक शांति का मार्ग है।

विज्ञापन / ADVERTISEMENT

🧭 दैनिक जीवन में उपयोगिता एवं मार्गदर्शन

Penerapan dalam Kehidupan Nyata

कार्यस्थल पर तनाव, असफलता के भय और मानसिक दबाव से बचने के लिए यह सबसे बड़ा सूत्र है। अपने वर्तमान कार्य में शत-प्रतिशत समर्पण दें और परिणाम की व्यर्थ चिंता छोड़कर शांतचित्त रहें।

🏛️ इतिहास, द्रष्टा ऋषि एवं वैदिक संदर्भ

यह श्लोक विश्वभर के विचारकों, वैज्ञानिकों और प्रबंधकों के लिए कार्य-संस्कृति (work ethics) का सबसे बड़ा प्रेरणास्रोत रहा है। लोकमान्य तिलक और महात्मा गांधी ने इसे अपने जीवन का मूलमंत्र माना।

Metrum / Chhandas: Anushtubh

Aspek Ketuhanan (Devata): Karma Yoga

← Ayat Sebelumnya (Taittiriya Upanishad 1.9.1) Ayat Selanjutnya (Bhagavad Gita 2.50) →