तेजोऽसि तेजो मयि धेहि वीर्यमसि वीर्यं मयि धेहि । बलमसि बलं मयि धेहि ओजोऽस्योजो मयि धेहि ॥
Tejo 'si tejo mayi dhehi vīryam asi vīryaṃ mayi dhehi | balam asi balaṃ mayi dhehi ojo 'sy ojo mayi dhehi ||

📖 भावार्थ एवं दार्शनिक विश्लेषण

"Shukla Yajurveda 19.9 का यह पावन मंत्र हमें Peace & Healing और सृष्टि के शाश्वत नियम (ऋत) के प्रति समर्पित रहने की प्रेरणा देता है। यह परमसत्ता और जीवन के दिव्य स्वरूप का वंदन करता है।"

यह दिव्य ऋचा Yajurveda से उद्भूत है, जिसके द्रष्टा Rishi Kashyapa हैं और मुख्य देवता Agni & Surya हैं। वैदिक संस्कृति में यह श्लोक मनुष्य और ब्रह्मांड के अटूट आध्यात्मिक संबंध को रेखांकित करता है तथा चेतना को उच्चतर सत्य की ओर अग्रसर करता है।

विज्ञापन / ADVERTISEMENT

🧭 दैनिक जीवन में उपयोगिता एवं मार्गदर्शन

Penerapan dalam Kehidupan Nyata

दैनिक जीवन में यह मंत्र हमें Peace & Healing के मार्ग पर चलने की शक्ति प्रदान करता है। तनाव, संशय और नैतिक दुविधाओं के समय इसका ध्यान मन को शांति, स्पष्टता और दृढ़ संकल्प प्रदान करता है।

🏛️ इतिहास, द्रष्टा ऋषि एवं वैदिक संदर्भ

वैदिक परंपरा की अमूल्य धरोहर के रूप में Shukla Yajurveda 19.9 का यह मंत्र युगों-युगों से ऋषियों और मुनियों द्वारा संजोया गया है। यह सनातन दर्शन की सार्वभौमिक प्रज्ञा का प्रतीक है।

Metrum / Chhandas: Yajur Prose

Aspek Ketuhanan (Devata): Agni & Surya

← Ayat Sebelumnya (Shukla Yajurveda 32.14) Ayat Selanjutnya (Shukla Yajurveda 40.11) →